2 करोड़ रुपए की रिश्वत लेते दलाल सज्जन कुमार ट्रैप, एसओजी एडिशनल एसपी मुकेश सोनी की भूमिका की जांच; जीरो टॉलरेंस की नीति पर उठे सवाल
2 करोड़ रुपए की रिश्वत लेते दलाल सज्जन कुमार ट्रैप, एसओजी एडिशनल एसपी मुकेश सोनी की भूमिका की जांच; जीरो टॉलरेंस की नीति पर उठे सवाल
वासुदेव व्यास
उदयपुर, मरु समीक्षा न्यूज़।
भ्रष्टाचार के खिलाफ राजस्थान में शनिवार को एक बड़ी और चौंकाने वाली कार्रवाई सामने आई है। भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) की टीम ने उदयपुर में 2 करोड़ रुपए की भारी-भरकम रिश्वत राशि लेते हुए एक कथित दलाल सज्जन कुमार को रंगे हाथों धर दबोचा। प्राथमिक जांच और एसीबी के अनुसार, यह रिश्वत राशि स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप (एसओजी) के एडिशनल एसपी मुकेश कुमार सोनी के नाम पर किसी दर्ज मुकदमे में मदद और राहत पहुंचाने की एवज में ली जा रही थी।
कैसे रचा गया ट्रैप का जाल?
एसीबी को शिकायत मिली थी कि एसओजी में दर्ज एक मामले में आरोपी/परिवादी को राहत देने के बदले में बड़ी रकम की मांग की जा रही है। शिकायत मिलने के बाद एसीबी की टीम ने बेहद गोपनीय तरीके से मामले का सत्यापन (Verification) कराया।
शिकायत की पुष्टि होने पर शनिवार को एसीबी की टीम ने योजनाबद्ध तरीके से जाल बिछाया। जैसे ही दलाल सज्जन कुमार ने तय स्थान पर परिवादी से 2 करोड़ रुपए की रिश्वत स्वीकार की, पहले से घात लगाकर बैठी एसीबी टीम ने उसे रंगे हाथों दबोच लिया।
उच्चाधिकारियों के निर्देशन में हुई कार्रवाई
यह पूरी कार्रवाई एसीबी के शीर्ष अधिकारियों के दिशानिर्देशों पर अंजाम दी गई
सुपर विजन डीआईजी डॉ. रामेश्वर सिंह,
नेतृत्व, एसीबी सीआई डॉ. सोनू शेखावत एवं एएसपी गोपाल स्वरूप मेवाड़ा
निर्देशन, एसीबी डीजी गोविंद गुप्ता एवं एडीजी स्मिता श्रीवास्तव
एडिशनल एसपी पर शिकंजा, ठिकानों पर तलाशी जारी
दलाल सज्जन कुमार की गिरफ्तारी के बाद अब जांच की सुई एसओजी के एडिशनल एसपी मुकेश कुमार सोनी की तरफ घूम गई है। एसीबी अधिकारियों के मुताबिक, रिश्वतकांड में अधिकारी की संलिप्तता, रकम के लेन-देन के माध्यम और अन्य संभावित संपर्कों की गहनता से पड़ताल की जा रही है। एसीबी की अलग-अलग टीमें मामले से जुड़े संभावित ठिकानों पर छापेमारी और दस्तावेजों की जांच में जुटी हैं।
सवाल – जब ‘रक्षक’ ही भक्षक बनें, तो कैसे साकार होगा ‘जीरो टॉलरेंस’?
राजस्थान सरकार और राज्य के मुख्यमंत्री प्रदेश में भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ (Zero Tolerance) की नीति का दावा करते हैं। लेकिन जब कानून-व्यवस्था और जांच की जिम्मेदारी संभालने वाली एसओजी (SOG) जैसी शीर्ष जांच एजेंसियों के बड़े अधिकारी ही करोड़ों की रिश्वतखोरी के घेरे में आने लगें, तो व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
सवाल यह है कि यदि भ्रष्टाचार मिटाने और अपराधियों को पकड़ने वाले जिम्मेदार अधिकारी ही घूसखोरी में लिप्त हो जाएंगे, तो आम जनता न्याय की उम्मीद किससे करेगी?
क्या केवल निचली सतह पर कार्रवाई से जीरो टॉलरेंस का विजन पूरा हो पाएगा या फिर प्रशासनिक तंत्र में गहराई तक जड़े जमा चुके इस भ्रष्टाचार पर कोई ठोस और सख्त प्रहार होगा?
