कबीरदास जी केवल एक महान संत और कवि ही नहीं थे, बल्कि समाज सुधारक, निर्भीक चिंतक और निर्गुण भक्ति के सबसे प्रखर प्रवक्ता भी थे।*

vasudev vyas

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*कबीरदास जी केवल एक महान संत और कवि ही नहीं थे, बल्कि समाज सुधारक, निर्भीक चिंतक और निर्गुण भक्ति के सबसे प्रखर प्रवक्ता भी थे।*

*उन्होंने जाति-पांति, ऊँच-नीच, आडंबर, कर्मकांड और धार्मिक पाखंड का खुलकर विरोध किया। उनका संदेश था कि ईश्वर मंदिर, मस्जिद या बाहरी कर्मकांड में नहीं, बल्कि मनुष्य के निर्मल हृदय और सत्य आचरण में बसता है*।

*उनकी वाणी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी लगभग छह सौ वर्ष पूर्व थी। उन्होंने कहा—*

> “*माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर।*

*कर का मनका छोड़ दे, मन का मनका फेर॥”*

और—

> “*बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय*।

*जो मन खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय॥”*

तथा—

> “*पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।*

*ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय॥”*

कबीरदास जी के निर्गुण भक्ति दर्शन का मूल संदेश था कि परमात्मा निराकार, सर्वव्यापी और प्रत्येक जीव के भीतर विद्यमान है। उन्होंने प्रेम, सत्य, करुणा, समभाव और मानवता को ही सबसे बड़ा धर्म बताया।

*श्रद्धा-संदेश*

संत शिरोमणि कबीरदास जी की जयंती पर विनम्र श्रद्धांजलि, भावांजलि एवं स्वरांजलि।

संत कबीरदास जी भारतीय संत परंपरा के ऐसे अमर प्रकाश-स्तंभ हैं, जिनकी वाणी आज भी मानवता को सत्य, प्रेम, समरसता और आत्मचिंतन का मार्ग दिखाती है। उन्होंने निर्गुण भक्ति के माध्यम से यह संदेश दिया कि ईश्वर किसी एक धर्म, जाति, मंदिर या मस्जिद तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रत्येक प्राणी के अंतर्मन में विद्यमान है।

कबीर साहब ने समाज में फैले पाखंड, अंधविश्वास, जातिगत भेदभाव, बाह्य आडंबर और कर्मकांड का निर्भीक होकर विखंडन किया। उन्होंने मानव को मानव से जोड़ने का कार्य किया और प्रेम, सेवा, सदाचार तथा सत्य को जीवन का सर्वोच्च धर्म बताया।

उनकी अमर वाणी आज भी हमें झकझोरती है—

“माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर।
कर का मनका छोड़ दे, मन का मनका फेर॥”

“बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।
जो मन खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय॥”

“पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय॥”

कबीर के भजन, साखियाँ और दोहे केवल साहित्य नहीं, बल्कि जीवन जीने की अमूल्य शिक्षा हैं। उनकी वाणी हमें बताती है कि सच्ची पूजा मन की निर्मलता, प्रेम, दया और मानव सेवा में है।

आइए, उनकी जयंती पर हम संकल्प लें कि जाति, धर्म, भाषा और ऊँच-नीच के सभी भेद मिटाकर मानवता, प्रेम, भाईचारे और सत्य के मार्ग पर चलेंगे। यही संत कबीरदास जी के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि, भावांजलि और स्वरांजलि होगी।
संत कबीरदास जी के जन्म-वर्ष को लेकर इतिहासकारों में कुछ मतभेद हैं, लेकिन कबीर पंथ और अधिकांश परंपराओं में यह माना जाता है कि उनका प्राकट्य विक्रम संवत 1455 में हुआ था।

इस मान्यता के अनुसार:
जन्म तिथि (हिन्दू पंचांग): ज्येष्ठ मास, शुक्ल पक्ष, पूर्णिमा (ज्येष्ठ पूर्णिमा)
विक्रम संवत: 1455
ईस्वी सन्: 1398 ईस्वी (परंपरागत मान्यता)
आज (29 जून 2026) की विक्रमी तिथि:
विक्रम संवत: 2083,मास: ज्येष्ठ
पक्ष: शुक्ल पक्ष
तिथि: पूर्णिमा (ज्येष्ठ पूर्णिमा) — इसी दिन संत कबीरदास जी की जयंती मनाई जा रही है।
यदि परंपरागत जन्म-वर्ष विक्रम संवत 1455 को आधार माना जाए, तो:
2083 − 1455 = 628 वर्ष
अर्थात आज संत कबीरदास जी का 628वाँ प्राकट्य/जन्मोत्सव मनाया जा रहा है (परंपरागत विक्रमी गणना के अनुसार)।
सारांश:
जन्म तिथि: ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा

जन्म संवत: विक्रम संवत 1455

आज की तिथि: ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा, विक्रम संवत 2083

आज: संत कबीरदास जी का 628वाँ प्राकट्य दिवस (जयंती) मनाया जा रहा है।
कोटि-कोटि नमन
सादर

गौरी शंकर भाटिया,
बीकानेर
ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा विक्रम संवत् 2083

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