शास्त्रों में 84 लाख योनियों का वर्णन, कर्मों के आधार पर जन्म की मान्यता

vasudev vyas

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शास्त्रों में 84 लाख योनियों का वर्णन, कर्मों के आधार पर जन्म की मान्यता
बीकानेर। सनातन धर्म के शास्त्रीय वर्णन में जीव-जगत की 84 लाख योनियों का उल्लेख मिलता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जीवों की उत्पत्ति को चार प्रमुख श्रेणियों में विभाजित किया गया है—अण्डज, स्वेदज, उद्भिज और जरायुज।
अण्डज में अण्डे से उत्पन्न होने वाले जीव, स्वेदज में पसीने अथवा गंदगी से उत्पत्ति माने जाने वाले जीव, उद्भिज में पृथ्वी से उत्पन्न होने वाली वनस्पतियां तथा जरायुज में गर्भ की झिल्ली के भीतर जन्म लेने वाले मनुष्य, पशु और स्तनधारी जीवों को शामिल किया गया है।
शास्त्रीय मान्यता के अनुसार 84 लाख योनियों को विभिन्न वर्गों में भी विभाजित किया गया है। इनमें 30 लाख पशु-चौपाया, 20 लाख वनस्पति, 10 लाख पक्षी, 11 लाख कीट-पतंगे, 9 लाख जलचर तथा 4 लाख मानव एवं अन्य योनि बताई गई हैं। इस प्रकार इनकी कुल संख्या 84 लाख मानी गई है।
धार्मिक मान्यताओं में यह भी कहा गया है कि जीव अपने कर्मों के अनुसार विभिन्न योनियों में जन्म प्राप्त करता है। पाप कर्मों के कारण जीव को विभिन्न योनियों में जन्म लेने की मान्यता है, जबकि सत्य, सद्कर्म और धर्माचरण को मनुष्य जीवन की श्रेष्ठ दिशा बताया गया है।
वेद, पुराण और अन्य धार्मिक ग्रंथों में जीवन, कर्म और पुनर्जन्म को लेकर विस्तृत धार्मिक विचार मिलते हैं। 84 लाख योनियों की यह अवधारणा सनातन परंपरा में जीव-जगत और कर्म सिद्धांत को समझाने वाली प्रमुख मान्यताओं में से एक मानी जाती है।
नोट: 84 लाख योनियों की संख्या और उनके वर्गीकरण को धार्मिक/शास्त्रीय मान्यता के रूप में प्रस्तुत किया जाता है; आधुनिक वैज्ञानिक वर्गीकरण इससे अलग है।

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