पिता केवल संबंध नहीं, जीवन की कठोरताओं से बचाने वाली ढाल थे -डॉ. कंचन पुरोहित
पिता केवल संबंध नहीं, जीवन की कठोरताओं से बचाने वाली ढाल थे -डॉ. कंचन पुरोहित
बीकानेर। पिता का साया हर बच्चे के लिए उस छत्र की तरह होता है, जिसकी मौजूदगी में जीवन की कठिनाइयां भी कुछ कम भयावह लगती हैं। पिता के बिछुड़ने के बाद ही उनके होने का वास्तविक अर्थ समझ में आता है। बीकानेर के स्वर्गीय प्रहलाद आचार्य के निधन के बाद उनकी पुत्री डॉ. कंचन पुरोहित ने भावुक होते हुए पिता की स्मृतियों को शब्दों में पिरोया।
डॉ. कंचन पुरोहित ने कहा कि जब तक पिता घर में होते हैं, तब तक संसार उतना भयावह नहीं लगता। हमें पता भी नहीं चलता, लेकिन हमारे और जीवन की कठोरताओं के बीच पिता चुपचाप एक मजबूत दीवार बनकर खड़े रहते हैं। वे हमारे हिस्से की अनेक चिंताएं, अपमान और अभाव स्वयं तक रोक लेते हैं।
उन्होंने पिता को याद करते हुए कहा कि बचपन की निश्चिंतता के पीछे कहीं न कहीं पिता का संरक्षण होता है। जब मनुष्य बड़ा होता है और पिता बूढ़े होते हैं, तब धीरे-धीरे एहसास होता है कि पिता केवल एक रिश्ता नहीं थे, बल्कि वे वह दूरी थे, जो हमें जीवन की कठोर सच्चाइयों से बचाकर रखती थी।
पिता
जब तक पिता घर में होते हैं,
तब तक संसार उतना भयावह नहीं लगता।
क्योंकि हम नहीं जानते,
पर हमारे और जीवन के बीच
एक व्यक्ति खड़ा होता है—
चुपचाप।
वह हमारे हिस्से की
अनेक चिंताएं,
अनेक अपमान,
अनेक अभाव
स्वयं तक रोक लेता है।
इसलिए बचपन इतना निश्चिंत होता है।
और फिर एक दिन
मनुष्य बड़ा होता है,
पिता बूढ़े होते हैं।
और पहली बार समझ आता है—
पिता एक संबंध नहीं थे।
पिता वह दूरी थे,
जो हमें जीवन की कठोरताओं से
अलग रखती थी।
पिता—संरक्षण थे,
पिता—जीवन थे,
पिता—सत्य थे।
पिता के बिछुड़ने के बाद
घर वही रहता है,
दीवारें वही रहती हैं,
लेकिन वह सुरक्षा देने वाला साया
हमेशा के लिए चला जाता है।
स्वर्गीय प्रहलाद आचार्य की स्मृतियों को याद करते हुए डॉ. कंचन पुरोहित के ये भाव उनके प्रति गहरे सम्मान, प्रेम और पुत्री के हृदय में बसे पिता के अमिट स्थान को दर्शाते हैं।

