बीकानेर निकाय चुनाव: बागियों ने बढ़ाई भाजपा-कांग्रेस की चिंता, कई वार्डों में त्रिकोणीय मुकाबले के आसार

vasudev vyas

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बीकानेर निकाय चुनाव: बागियों ने बढ़ाई भाजपा-कांग्रेस की चिंता, कई वार्डों में त्रिकोणीय मुकाबले के आसार

बीकानेर। नगर निगम चुनाव को लेकर बीकानेर में सियासी सरगर्मियां तेज हो गई हैं। दोनों प्रमुख दल भाजपा और कांग्रेस के प्रत्याशियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती अब पार्टी के भीतर से ही उभरते बागियों और निर्दलीय उम्मीदवारों की दिखाई दे रही है। वार्डों के सर्वे के दौरान सामने आया है कि जिन वार्डों में टिकट वितरण से नाराज नेताओं और निवर्तमान अथवा पूर्व पार्षदों ने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में ताल ठोकी है, वहां भाजपा और कांग्रेस दोनों के अधिकृत प्रत्याशियों की राह मुश्किल हो सकती है।
निवर्तमान पार्षदों ने भी जमकर ठोकी ताल
भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों में कई निवर्तमान पार्षद तथा प्रमुख दावेदार चुनाव मैदान में हैं। भाजपा की ओर से प्रतीक स्वामी, विकास सियाग, प्रमोद सिंह शेखावत तथा पार्षद प्रत्याशी विजय बाफना प्रमुख नामों में शामिल हैं। वहीं कांग्रेस की ओर से प्रफुल्ल हटीला, वसीम फिरोज, शिवशंकर बिस्सा और महेन्द्र बडगुजर चुनावी मैदान में हैं।
इसके अलावा निर्दलीय प्रत्याशियों में रमजान कच्छावा तथा पार्षद प्रतिनिधि वसीम खिलजी भी प्रमुखता से चुनाव लड़ रहे हैं।
पूर्व पार्षद भी मैदान में, टिकट कटने से नाराजगी
इस बार 2019 से पहले पार्षद रह चुके कई चेहरे भी दोबारा चुनाव मैदान में नजर आ रहे हैं। इनमें दिनेश उपाध्याय, भगवती प्रसाद गौड़, गुड्डी देवी, दीन मो, शहाबुद्दीन भुट्टो और मोहम्मद ताहिर प्रमुख हैं। बताया जा रहा है कि इनमें से कुछ नेता पार्टी से टिकट नहीं मिलने के बाद नाराज होकर चुनाव मैदान में उतरे हैं। ऐसे प्रत्याशी अपने पुराने जनसंपर्क और व्यक्तिगत प्रभाव के दम पर अधिकृत प्रत्याशियों के लिए चुनौती खड़ी कर सकते हैं।
बागियों से इन वार्डों में सबसे ज्यादा खतरा
वार्डों के सर्वे में सामने आया कि वार्ड 2, 3, 8, 11, 13, 22, 23, 24, 25, 26, 32, 38, 43, 52, 53, 62, 63, 64, 71, 72, 73, 79 और 80 में निर्दलीय तथा पार्टी से बगावत कर चुनाव लड़ रहे प्रत्याशी मुकाबले को प्रभावित कर सकते हैं।
राजनीतिक जानकारों के अनुसार इन वार्डों में बागी प्रत्याशियों को मिलने वाला वोट सीधे तौर पर भाजपा या कांग्रेस के अधिकृत प्रत्याशी के समीकरण को प्रभावित कर सकता है। कई जगह मुकाबला त्रिकोणीय होने की स्थिति में जीत का अंतर भी काफी कम रहने की संभावना है।
बागी बने तो ‘वोट कटवा’ या जीत के निर्णायक?
चुनावी तस्वीर में सबसे बड़ा सवाल यही है कि बागी प्रत्याशी केवल वोट काटेंगे या स्वयं जीत का रास्ता भी बनाएंगे। यदि किसी वार्ड में भाजपा या कांग्रेस के नाराज कार्यकर्ता और स्थानीय प्रभावशाली चेहरे एकजुट होकर निर्दलीय प्रत्याशी के पक्ष में मतदान करवाने में सफल रहे, तो इसका सीधा असर दोनों प्रमुख दलों के अधिकृत प्रत्याशियों पर पड़ सकता है।
फिलहाल नामांकन के बाद सामने आए समीकरणों ने भाजपा और कांग्रेस दोनों की चिंता बढ़ा दी है। अब चुनाव प्रचार के दौरान कौन सा दल अपने नाराज नेताओं और कार्यकर्ताओं को साध पाता है, यही कई वार्डों के चुनाव परिणाम में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

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