रामनिवास मेहता ने अपनी पुस्तक ‘डर, साहस और भी बहुत कुछ…’ में प्रशासनिक व्यवस्था, राजनीति, न्यायपालिका, उच्च शिक्षा और सरकारी तंत्र के कामकाज पर कई गंभीर सवाल उठाए

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,रामनिवास मेहता ने अपनी पुस्तक ‘डर, साहस और भी बहुत कुछ…’ में प्रशासनिक व्यवस्था, राजनीति, न्यायपालिका, उच्च शिक्षा और सरकारी तंत्र के कामकाज पर कई गंभीर सवाल उठाए

24 अगस्त: राजस्थान लोक सेवा आयोग के सचिव पद से 31 जुलाई 2026 को सेवानिवृत्त हुए पूर्व आईएएस अधिकारी रामनिवास मेहता ने अपनी पुस्तक ‘डर, साहस और भी बहुत कुछ…’ में प्रशासनिक व्यवस्था, राजनीति, न्यायपालिका, उच्च शिक्षा और सरकारी तंत्र के कामकाज पर कई गंभीर सवाल उठाए हैं। पुस्तक 19 अगस्त 2026 को प्रकाशित हुई है और इसमें मेहता ने अपने प्रशासनिक जीवन के अनुभवों के साथ व्यवस्था को लेकर अपने विचार दर्ज किए हैं।
जनप्रतिनिधि आधुनिक दौर के राजा बन रहे या व्यवस्था में नैतिक पतन बढ़ रहा?
मेहता ने सवाल उठाया है कि आजादी के करीब 80 साल बाद भी आम नागरिक अपने अधिकारों से वंचित क्यों है और समाज में भाईचारा एवं सौहार्द्र क्यों कम होता जा रहा है। उन्होंने सवाल किया कि क्या निर्वाचित जनप्रतिनिधि आधुनिक दौर के राजा-महाराजा बन रहे हैं, सरकारी कर्मचारी लोकसेवक का धर्म नहीं निभा रहे या समाज में ही नैतिक पतन बढ़ रहा है। उनका कहना है कि जनसेवा का दिखावा करने वाले लोग व्यवस्था को और मुश्किल बना रहे हैं।
अधिकारियों को राजनीतिक नजदीकी से दूर रहने की सलाह
मेहता ने नौकरशाहों को राजनीतिक प्रभाव से दूरी बनाए रखने और चुनाव के दौरान पूर्ण निष्पक्षता एवं पारदर्शिता बरतने की सलाह दी है। उनके अनुसार यह केवल कानूनी जिम्मेदारी नहीं, बल्कि अधिकारी की व्यक्तिगत सुरक्षा और मानसिक शांति के लिए भी जरूरी है। उन्होंने युवा और ईमानदार अधिकारियों से कठिन परिस्थितियों में भी कर्तव्य एवं नैतिकता से समझौता नहीं करने की अपील की है।
न्याय व्यवस्था में ‘तारीख पर तारीख’ पर चिंता
पुस्तक में न्याय व्यवस्था को लेकर भी उन्होंने चिंता जताई है। मेहता के अनुसार कई मामलों में तत्काल न्याय की उम्मीद के बजाय लंबी कानूनी प्रक्रिया और लगातार तारीखें ही न्याय का पर्याय बन जाती हैं। उनका मानना है कि जब तक ऐसी व्यवस्थागत समस्याओं में बदलाव नहीं होगा, तब तक आम नागरिक को वह सामाजिक वातावरण नहीं मिल पाएगा, जिसका वह हकदार है।
निजी विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षा पर भी सवाल
पूर्व आईएएस ने राजस्थान की उच्च शिक्षा व्यवस्था पर भी गंभीर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने निजी विश्वविद्यालयों में कथित अनियमितताओं, फर्जी डिग्रियों और कम समय में पीएचडी जैसी घटनाओं का उल्लेख करते हुए इन्हें शैक्षणिक व्यवस्था के पतन का संकेत बताया। उनका सवाल है कि जब राज्य सरकार के पास अनियमितताओं की जांच और कार्रवाई के अधिकार हैं तो उनका प्रभावी इस्तेमाल क्यों नहीं किया जाता।
उदयसागर झील में होटल निर्माण का मामला
मेहता ने उदयपुर की उदयसागर झील में होटल निर्माण से जुड़े मामले को भी पुस्तक में विस्तार से शामिल किया है। उनके अनुसार यूआईटी सचिव रहते उन्होंने वेटलैंड नियमों का उल्लंघन पाए जाने पर होटल निर्माण की अनुमति के नवीनीकरण का आवेदन खारिज किया था। होटल मालिक ने इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। मेहता के मुताबिक 29 अक्टूबर 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने उन पर एक लाख रुपए का जुर्माना लगाया। इसके बाद उन्होंने यूआईटी से निर्माण अनुमति का नवीनीकरण कर दिया।
पिस्टल तानने की घटना भी साझा की
मेहता ने 3 फरवरी 2005 की उस घटना का भी उल्लेख किया है, जब वे झालावाड़ के मनोहर थाना में एसडीएम थे। उन्होंने लिखा कि उपसरपंच चुनाव में दोबारा मतदान की मांग को लेकर तत्कालीन भाजपा नेता कंवरलाल मीणा ने उनकी कनपटी पर पिस्टल तान दी थी। घटना के बाद 15 मार्च 2005 को तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने उन्हें बुलाकर पूरी जानकारी ली। मेहता ने लिखा कि उन्हें आशंका थी कि उनका तबादला हो जाएगा, लेकिन वे करीब एक साल तक वहीं पदस्थ रहे।
युवाओं को नैतिकता से समझौता नहीं करने का संदेश
मेहता के अनुसार पुस्तक लिखने का उद्देश्य युवाओं और भावी प्रशासकों को सरकारी तंत्र की वास्तविक कार्यप्रणाली तथा ईमानदारी से काम करने वालों के सामने आने वाली चुनौतियों से परिचित कराना है। उनका कहना है कि कठिन परिस्थितियों में गलत रास्ते आसान लग सकते हैं, लेकिन अनैतिक रास्ता अंततः व्यक्ति की मूल व्यवस्था और मूल्यों को नुकसान पहुंचाता है। पुस्तक में प्रशासनिक अनुभवों के माध्यम से उन्होंने राजनीतिक नेतृत्व, नौकरशाही और न्यायपालिका में सकारात्मक बदलाव की जरूरत पर जोर दिया है।

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